गुलज़ार की नज़्में

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                            गुलज़ार की नज़्में

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी
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HINDI SAYARI- GULZAR SHAYARI BEST COLLECTION 2020 IN HINDI


साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं
आदतें भी अजीब होती हैं
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उस से कहना…”
इतना कहा… और फिर गर्दन नीची कर के
देर तलक वो पैर के अँगूठे से मिट्टी खोद-खोदके 
बात का कोई बीज था, शायद, ढूंढ़ रही थी
देर तलक खामोश रही…
नाक से सिसकी पोंछ के आख़िर 
गर्दन को कन्धे पर डाल के बोली,
“बस… इतना कह देना!
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और तुम ऐसे गयीं
शहर की बिजली चली जाये अचानक जैेसे
और मुझको…
बन्द कमरे में बहुत देर तक कुछ भी दिखाई न दिया 
आँखें अँधेरे से मानूस हुईं तो…
फिर से दरवाज़े का ख़ाका-सा नज़र आया मुझे
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दरख़्त रोज़ शाम को…
बुरादा लेके दिन का अपनी शाखों पर,
पहाड़ी जंगलों के पार फेंक आते हैं
मगर वो दिन, … फिर से लौट आता है
रात के अँधेरें में 
जिसे मैं जंगलों में आरियों से,
शाख़-शाख़ काटके गिराके आया था
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आहिस्ता- आहिस्ता आख़िर पूरी बोतल ख़त्म हुई!
घूंट-घूंट ये साल पिया है
तल्ख़, ज़्यादा, तेजाबी और आतिशीं क़तरे
होंट अभी तक जलते हैं
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तुम्हारे ग़म की डली उठाकर
जुबां पर रख ली है देखो मैंने
ये  कतरा-कतरा पिघल रही है
मैं कतरा कतरा ही जी रहा हूँ
पिघल पिघलकर गले से उतरेगी
आखरी बूँद दर्द की जब
मैं साँस आखरी गिरह को भी खोल दूँगा

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चिपचिपे दूध से नहलाते हैं
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुंढाते हैं गिलसियां भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पांव पर पांव लगाये खड़े रहते हो
इक पथरायी सी मुस्कान लिये
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।
जब धुआं देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम,
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।
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मेरे साथ बैठकर
ये नज़्म रोज़ शाम को, शराब पीती है
मैं तो सिर्फ़ एक-दो ही जाम उतार लेता हूं
ये नज़्म रात देर तक सुराही के गले से 
लगके बैठी रहती है!

इसको तो कभी चढ़ी नहीं मगर
मुझको नज़्म कितने रोज़ तक उतरती ही नहीं!

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बारिश आती है तो पानी को भी लग जाते हैं पांव ,
दरो -दीवार से टकरा कर गुजरता है गली से
और उछलता है छपाकों में ,
किसी मैच में जीते हुए लड़को की तरह !
जीत कर आते हैं जब मैच गली के लड़के
जुटे पहने हुए कैनवस के ,
उछलते हुए गेंदों की तरह ,
दरो -दीवार से टकरा के गुजरते हैं
वो पानी के छपाकों की तरह 
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नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी
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